Saturday, October 6, 2012
Monday, October 3, 2011
तकदीर-ए-बेवफा

तकदीर-ए-बेवफा तुझे कब से बदल रहा हूँ मैं।
मुख्तलिफ हैं हवाएं फिर भी सम्हल रहा हूँ मैं॥
शीशे का बदन ढांके पत्थर के लिबासों में।
हर सिम्त ठोकरों से बचकर निकल रहा हूँ मैं॥
बेबस हूँ बेक़रार हूँ बेजार हो चुका हूँ मैं।
इक बार आ जा जिंदगी तन्हा मचल रहा हूँ मैं॥
बेघर हूँ इस तपिश में हमसाया नहीं कोई।
तेरे दर्द से पिघल कर अश्कों में ढल रहा हूँ मैं॥
हैं सिलसिले ग़मों के कुछ खुशनुमा नहीं है।
गुलशन है तेरा फिर भी काँटों में पल रहा हूँ मैं॥
ए "इश्क" तेरा मंजिल-ओ-अंजाम मुक़र्रर है।
एक रोशनी की खातिर सदियों से जल रहा हूँ मैं॥
........."इश्क" सुल्तानपुरी।
आशनाई की मंजिल

जिंदगी में खुमार आ जाये।
तुमपे दिल बेक़रार आ जाये॥
कब से बेचैन हैं तुम्हारे लिए।
आ भी जाओ करार आ जाये॥
आशनाई की ये ही मंजिल है।
जब कशिश बेशुमार आ जाये॥
ये गुजारिश है मेरी गुलशन से।
तुमको छू लूं निखार आ जाये॥
तुम खुदा की एक नेमत हो।
इक नजर देखें प्यार आ जाये॥
"इश्क" ये मेरी तमन्ना ही सही।
ख्वाब आये बहार आ जाये॥
........................"इश्क"सुल्तानपुरी।
Sunday, October 2, 2011
इकतरफा मुहब्बत
दर-दर की ठोकरें हैं बेबस है जिंदगानी ।
इकतरफा मुहब्बत है गम की है मेहरबानी ।।
दिल आशना हो जिस पर वो दूर जा बसेगा ।
किस शै से दिल लगाऊं किसको कहूं निशानी ।।
मेरे नक्श-ए-पा पे चलकर हमराह गम हुए हैं।
बचपन था खौफ मे अब हैरान है जवानी॥
वो हर कदम पे अपने तारीखें लिख रहे हैं।
हम कर गए बहुत कुछ कहते हैं मुंहजबानी॥
अब "इश्क " क्या तुम्हें भी गम रास आ गए हैं।
हर बार फ़ना होकर बन जाते हो कहानी॥
'इश्क' सुल्तानपुरी ॥
Saturday, May 14, 2011
हम भी अब दिल को समझाने लगे हैं

हम भी अब दिल को समझाने लगे हैं।
खास अपने जब से बेगाने लगे हैं॥
टूट जाते हैं हमेशा ये खयाली एतबार।
जब दिलों पर जख्म अनजाने लगे हैं।।
लूटते हैं मुल्क को अब रहनुमा।
सिक्कों से ईमान तुलवाने लगे हैं॥
मुफलिसी के आंसुओं की सींच से।
हम सियासी फसल उपजाने लगे हैं॥
झीना - झीना है जम्हूरी पैराहन।
बस जरा करवट से फट जाने लगे हैं॥
''इश्क'' कैसे ठीक हों हालात ये।
फैसले कातिल से लिखवाने लगे हैं॥
......................."इश्क" सुल्तानपुरी...........
Tuesday, November 16, 2010
इक नजर

जीने के लिए दुनिया मे ये भी खता करेंगे ।
तू जितना सताएगा हम उतनी वफ़ा करेंगे ॥
तेरा रास्ता तकेगी मेरे दिल की बज़्म आखिर ।
तेरी इक नजर की खातिर सबको खफा करेंगे ॥
तेरी इक झलक की दिल मे है आरजू सभी के ।
सब किछ निसार कर भी ये इक नफा करेंगे ॥
मुझसे भी पहले कितने आये थे जाने वाले ।
आएगा हश्र जिस दिन उस दिन दफा करेंगे ॥
ऐ ''इश्क'' ये लगन है दिल मे मेरे समाई ।
गैरों से गिला छोड़कर खुद को सफा करेंगे ॥
Wednesday, November 18, 2009
इक आदमी पाया गया है
हमको हर इक दर पे अजमाया गया है।
कारवाँ के बीच मे इक आदमी पाया गया है॥
रोज़ बारीकी से सुलझाता हूँ उलझे मसले।
सिलसिले हैं नित सवालों के नया लाया गया है॥
फ़िर रहे उम्मीद पर थम जाएगा ये दौर भी।
फ़िर किसी आवाज़ मे जोश-ऐ-ग़दर पाया गया है॥
सोंचा था हम भी चलें टूटे दिलों को जोड़ दें।
हमको ही काफ़िर पुकारा जुल्म ये ढाया गया है॥
देखना मजमून का चर्चा न कर दे बज़्म मे।
ख़त भी कासिद से ही लिखवाया गया है॥
देने वाला है दगा कोई ख़बर फ़िर से छपेगी।
हाथ दुश्मन से मेरा खलवत मे मिलवाया गया है॥
"इश्क" जब भी गर्दिशों से जंग से हम बच गए।
हुश्न के हाथों की तलवारों से मरवाया गया है॥
कारवाँ के बीच मे इक आदमी पाया गया है॥
रोज़ बारीकी से सुलझाता हूँ उलझे मसले।
सिलसिले हैं नित सवालों के नया लाया गया है॥
फ़िर रहे उम्मीद पर थम जाएगा ये दौर भी।
फ़िर किसी आवाज़ मे जोश-ऐ-ग़दर पाया गया है॥
सोंचा था हम भी चलें टूटे दिलों को जोड़ दें।
हमको ही काफ़िर पुकारा जुल्म ये ढाया गया है॥
देखना मजमून का चर्चा न कर दे बज़्म मे।
ख़त भी कासिद से ही लिखवाया गया है॥
देने वाला है दगा कोई ख़बर फ़िर से छपेगी।
हाथ दुश्मन से मेरा खलवत मे मिलवाया गया है॥
"इश्क" जब भी गर्दिशों से जंग से हम बच गए।
हुश्न के हाथों की तलवारों से मरवाया गया है॥
Wednesday, May 13, 2009
बहुत मोहताज़ हूँ

बहुत मोहताज़ हूँ लेकिन दिल-ऐ-जागीर रखता हूँ।
छुपाकर अपने सीने मे तेरी तस्वीर रखता हूँ॥
बदलते हैं यहाँ हालात मौसम के इशारे पर।
मैं वो माली हूँ गुलशन मे तेरी तासीर रखता हूँ॥
तुम्हारी बज्म से हटकर मैं चुप हूँ कुछ नहीं कहता।
जहाँ चर्चा तुम्हारा हो वहीं तक़रीर रखता हूँ॥
मोहब्बत से मेरी आजाद होना गैर-मुमकिन है।
चहर दीवारी है ऊंची बंधी जंजीर रखता हूँ॥
फ़िदा हैं ''इश्क'' यूँ अब शायरी का शौक करते हैं।
जुबाँ पर लब्ज-ऐ-ग़ालिब है जिगर मे मीर रखता हूँ॥
Saturday, April 18, 2009
हकीकत और ख्वाबों मे

ये दुनिया वो नही दिखती है जो तामीर होती है।
हकीकत और ख्वाबों मे अलग तस्वीर होती है॥
किसी की बेवफाई का गिला करके भी क्या हासिल।
हँसी सूरत मे जो शीरत है वो बेपीर होती है॥
फरेबी की है ये ख्वाहिश कि मैं उस जैसा हो जाऊं।
नहीं बन पाया मैं ये खून की तासीर होती है॥
सियासतदां के अल्फाजों से तख्त-ओ-ताज मिलते हैं।
मगर शायर कि खुद्दारी भी इक जागीर होती है॥
ये जज्बातों का नक्शा ''इश्क'' कि कारीगरी देखो।
जहाँ दिल सीने मे हो पाँव मे जंजीर होती है॥
Thursday, April 9, 2009
वक्त का दरिया

वक्त के दरिया मे हलचल हो रही है।
गम की जानिब से हवाएं चल रही हैं॥
जिंदगी को बुनता हूँ हर रोज मैं।
टूट जाती है लडी जो कल रही है॥
सुबहा से उम्मीद मिलती शाम से हैरानियाँ।
जिंदगी इस कश-म-कश में ढल रही है॥
कर दिया इजहार-ऐ-दिल बेफिक्र हो।
जाने कब से ये मुहब्बत पल रही है॥
''इश्क'' की है आरजू हर शै बुझाऊँ।
जो दिलों मे नफरतों सी जल रही है॥
Tuesday, February 24, 2009
आरजू रकीबों की

वक्त जब हमपे बुरा आता है।
अपना साया भी मुंह छुपाता है॥
बादलों से गिला करें कैसे।
गम तो आँखों से बरस जाता है॥
रास्तों का कुसूर क्या होगा।
चलते चलते ही उन्मान बदल जाता है॥
ऐसी क्या हो गयी खता उससे।
आईना देख के शरमाता है॥
रेत का हो गया मरासिम भी।
पल मे बनता है बिगड़ जाता है॥
लाखों दुश्मन करीब होते हैं।
सच कोई जब जुबाँ पे लाता है॥
'इश्क' क्या आरजू रकीबों की।
दोस्तों से जो सितम पाता है॥
Tuesday, February 17, 2009
जिन्दा हूँ मैं

शाम फिर आयी
सवाल आया गुबार आया।
बेकरारी फिर तड़प उठी
कि रोना बेशुमार आया॥
रह गया बस कल का हासिल
आज भी ।
कर गया तनहा मुझे
हमराज भी॥
प्यास है बस सब्र भर
है दर्द का दरिया यहाँ।
वक्त का चुल्लू है खाली
लब नहीं खुलते यहाँ॥
कह दिया शाकी ने
कल आऊंगा मैं।
राह ताकना अब न
तरसाऊंगा मैं॥
बस तेरी इक आस मे
जिन्दा हूँ मैं।
वरना तुझसे जिंदगी
शर्मिंदा हूँ मैं॥
"इश्क" करके रात भर का जागना
मलाल आया खुमार आया।
बेकरारी फिर तड़प उठी
की रोना बेशुमार आया॥
"इश्क' सुल्तानपुरी
Tuesday, February 10, 2009
डूबता जाता हूँ मैं

जब से की है आशिकी वादों से टकराता हूँ मैं।
राह चलता हूँ कहीं की और कहीं जाता हूँ मैं।।
है जेहन में साफगोई दिल है पाकीजा मेरा।
पर अजीजों की निगाहों से गिरा जाता हूँ मैं॥
आजमाईश है दिलों की या जरूरत है कोई।
तेरी हर उलझन मिटाने मे मिटा जाता हूँ मैं॥
जानता हूँ गम ही मिलते हैं मुहब्बत वालों को।
थाह लेने हद की हद तक डूबता जाता हूँ मैं॥
"इश्क" हूँ नफ़रत मुझे है इस तरह शब्-स्याह से।
रोशनी के वास्ते खुद को जला जाता हूँ मैं॥
Saturday, January 31, 2009
जिसको भी आजमाया

एतबार ने किसी के मझधार मे डुबाया।
किसको कहूं मैं अपना यहाँ कौन है पराया।।
दरिया थमा हुआ था माकूल थी हवा भी।
किसपे लगाऊँ तोहमत मांझी ने सितम ढाया।।
बनते हैं मरासिम भी बादल की शक्ल जैसे।
ये चहरे बदलते हैं तूफाँ-ए-गम जो आया॥
इक दौर था जो महफ़िल हमसे ही जगामग थी।
इक दौर आज है जब ख़ुद आशियाँ जलाया॥
रोता हूँ तड़पता हूँ जिसकी वफ़ा की खातिर।
उसने सुना है मेरा हर एक निशाँ मिटाया॥
मौका परस्त दुनिया लोगों की साजिशों ने ।
तालीम को बिगाडा ईमाँ को डगमगाया॥
अब ' इश्क ' क्या करुँ मैं किसको खुदा बनाऊँ।
वही धोखेबाज निकला जिसको भी आजमाया॥
Friday, January 30, 2009
गम-ए -आशिकी

फिर टूटा दिल किसी का कोई हो गया दिवाना ।
लो याद आ गया फिर गुजरा हुआ जमाना ॥कई कत्ल हो चुके हैं गम-ए -आशिकी के पीछे।
देखो सितम सनम का मुसका के चले जाना॥
मुझे बारहा पुकारा रोंका था अजीजों ने ।
हुश्न-ए -जवां की जुम्बिश तेरी और खिंचे आना ।।
दिल पर बरस रहे है तेरी बेरुखी के पत्थर ।
टुकडों मे हो गया है शीशे का आशियाना ॥
यहाँ "इश्क" की गली मे कई नफरतों के घर हैं।
दस बार परखियेगा जब लेना हो ठिकाना ॥
Sunday, January 11, 2009
हकीकत

क्यूँ करे एतबार कोई क्यूँ ये दीवाना बने।
जब मुसीबत दर पे आये अपना बेगाना बने॥
कर लिया हर शौक हमने कर ली हद तक दिल्लगी।
अब नहीं ख्वाहिश है फिर से कोई अफसाना बने॥
खूब कर ले तू गुमां और खूब कर अय्याशियाँ।
दिन तेरा आने को है जब मिटटी का दाना बने॥
बस एक है खुद की कमाई नेकियाँ इन्सान की।
बाकी हैं वो दौलतें जिनके लिए अपना-बेगाना बने॥
है हकीकत एक ही जाना जिसे सबने जुदा।
मस्जिदों का दर हो चाहे द्वार बुतखाना बने॥
दोस्तों ये है रवायत प्यार के इस खेल की ।
हुश्न बन जाये शमां और ''इश्क'' परवाना बने॥
Thursday, December 18, 2008
एक ही प्रश्न
Friday, December 5, 2008
एहसास टकराते रहे

रात भर एहसास से एहसास टकराते रहे।
आए सनम आगोश मे शिकवे-गिले जाते रहे॥
दूरियां अब दूरियों से पूछती हैं दूरियां।
होंठ न कह पाए कुछ सांसों से थर्राते रहे॥
हाथ आए हाथ मे सब मन्नतें पूरी हुईं।
मेरे उनके दरमियाँ लम्हे भी मुसकाते रहे॥
करवटें-दर-करवटें थकता नहीं हममे कोई।
जिंदगी के पैराहन पर रंग बरसते रहे॥
''इश्क'' है इतनी ही ख्वाहिश आशनाई मे।
ख्वाब कुछ इस तरह के ही रात मे आते रहें॥
Monday, November 24, 2008
कारनामे सभी बेकार हुए जाते हैं

बेबसी मे बड़े बेजार हुए जाते हैं।
कारनामे सभी बेकार हुए जाते हैं॥
सूखते जा रहे मेहनतकशों के बदन यहाँ।
सूदखोरों के तन गुलजार हुए जाते हैं॥
मुल्क मे फ़ैली है तालीम फायदे वाली।
फ़िर जेहन अपने क्यों बीमार हुए जाते हैं॥
रोज होती हैं यां तकरीरें भाई -चारे की।
इल्म वाले ही क्यों दीवार हुए जाते हैं॥
जब नशा हुश्न की आंखों मे नही मिलता।
''इश्क'' वाले तभी मयख्वार हुए जाते हैं॥
Sunday, November 16, 2008
दर्द उठता है
दर्द उठता है आह उठती है ।
दिल पिघलता है चाह उठती है ॥
जब मोहब्बत का असर होता है।
जहाँ से रस्मो-राह उठती है ॥
देर तक जागे जो सुबह उनकी
रफ्ता-रफ्ता निगाह उठती है ॥
यहाँ बदनाम खुदा होता है ।
गरीबी जब कराह उठती है ॥
''इश्क'' का दर्द जिस गजल मे हो।
उसपे महफ़िल से वाह उठती है ॥
दिल पिघलता है चाह उठती है ॥
जब मोहब्बत का असर होता है।
जहाँ से रस्मो-राह उठती है ॥
देर तक जागे जो सुबह उनकी
रफ्ता-रफ्ता निगाह उठती है ॥
यहाँ बदनाम खुदा होता है ।
गरीबी जब कराह उठती है ॥
''इश्क'' का दर्द जिस गजल मे हो।
उसपे महफ़िल से वाह उठती है ॥
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