यह काल कहाँ ले जाएगा , है यक्छा प्रश्न नव पीढी का .
रोहन को आधार मिला , टूटे बांसों की सीढी का ॥
योवन की उर्वरा लगा , अवसाद की फसलें काट रहे .
तन के तरुवर को मृदा बना , अनंत कूप को पाट रहे ॥
असफलता से लड़ते-लड़ते, रेखाएं बनी ललाटों पर ।
मन्दिर-मस्जिद भी ऊब चुके , हैं ताले पड़े कपाटों पर ॥
सुधा कलश भी सूख गया , बस गरल घुला है तंत्रों में ।
विष को अमृत करने वाली , अब शक्ति नहीं है मंत्रों में ॥
क्छुधा ने टाप को विजित किया ,महालाक्छ्या निज स्वार्थ्य हुआ।
दर्शन के अंतश से निकला वो महाज्ञान भी व्यर्थ हुआ ॥
है पास हमारे जो कुछ भी , यदि उसमें संतोष नहीं ।
साधन कम हैं याचक ज्यादा , प्रकृति का इसमें दोष नहीं ॥
संसार बिचारा क्या देगा , जो स्वयं खड़ा झोली फैलाये ।
इससे लेने से अच्छा है , हम इसको कुछ देकर जायें ॥
के ० के ० मिश्रा
''इश्क '' सुल्तानपुरी ।
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lajawab
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